नए साल की पार्टियां : अकेलेपन का छलावा या जश्न का उत्साह ? हर...
व्यंग लेख
जेब और प्रेस्टीज मेरी ज़ेब कट गई। शुभचिंतक कहते हैं – गनीमत है, ज़ेब...
निर्वाचन और शासकीय सेवक की मनःस्थिति.. चुनाव याने चुनना अन्धों में एक काणे को,...
कबाडी राकेश शंकर त्रिपाठीकानपुर प्रत्येक सुबह का सूरज सदैव एक आस, एक विश्वास, नयी...
अधजल गगरी छलकत जाय योगेश कुमार अवस्थी कोलकाता कहने को तो यह एक मुहावरा...
सम्पन्नता और फिजूलखर्ची यह कटु सत्य है कि मनुष्य के जीवन में धन की...
आप से भी खूबसूरत आप के अंदाज़ हैं मैं बहुत ईमानदार हूँ बल्कि मुझे...
झुकना ज़रूरी है अल्हड़ उम्र में मैं अक्सर अपने भविष्य को को लेकर लापरवाह...
पुस्तक की व्यथा मै आज भी उसी स्थान पर बैठी हूँ, जब मैं पहली...

